Saturday, 20 February 2016

गुज़ारिश


                                                             


  मेरा मन , क्यों है इतनी बेचैनी 
दूर होगी तेरी परेशानी 
बस युहीं होते है खुदा के इम्तहान 
एक दिन होगी रोशन सारा जहाँ 

बहती हुई हवाएं कहती है कुछ ग़ुम -सुम ग़ुम -सुम 
कैसे हटाएं नज़रें यूँ तेरे चेहरे से  मासूम मासूम 

जब छूती है तेरी खयाले मन को मेरी 
रूह जाग उठता है जैसे मिली हो उसे एक ज़िन्दगी नयी 

तुझे इल्म भी  न होगा इन बातों में 
जो आवाज़ गूंजती है मेरे हर ज़र्रे  मैं 

तेरे ही ख़यालो में खोया हुआ मैं 
न है पता मुझको इब्तदा की न इन्तेहा की 

तेरे  ही ख्वाबों में बस रही है ज़िन्दगी मेरी 
इन ख्वाबों को बदले हकीकत में ,यही है गुज़ारिश मेरी 


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